जाति नहीं, जूना अखाड़े में योग्यता की कद्र

इलाहाबाद संन्यास लेने पर जाति बेमानी हो जाती हैसनातन धर्म में ऐसी प्रथा सदियों परानी है। ऐसे दौर में जब सियासत सवर्ण बनाम दलित विमर्श में उलझी है.दलित वर्ग से उभरे संन्यासी कन्या प्रभनंद गिरि के पटाभिषेक कछ खास हो चला है। सामाजिक व धार्मिक समरसता की नींव मजबत करने का प्रयास माना जा रहा है यह कदम । प्रयाग में कंभ-2010 से पहले जना अखाडे में दलित वर्ग से आने वाले कछ और संन्यासियों को अहम पदवी दी जाएगी। बस उसका पैमाना जाति नहीं वरन योग्यता होगा। जना अखाडे से जडे पदाधिकारी कहते हैं कि हमारे यहां जाति के आधार पर भेद नहीं होगा। योग्यता के आधार पर पद प्रतिष्ठा दी जाती है ।सदियों पुरानी कहावत है जात न पछो साध की। जूना अखाड़े के साथ यह बात लागू रही है। यहां दलित वर्ग से आने वाले संन्यासी अहम पदों पर आसीन होते रहे हैं। अंग्रेजी हकमत के दौरान जब हिंदुओं को अलग-अलग वर्गों में बांटा गया तब 1887 में उसके विरोध में जूना अखाड़ा ने 14 दलित संन्यासियों को थानापति, कोतवाल, भंडारी व मंत्री जैसे पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। हाल की बात करें तो दलित वर्ग से आने वाले महंत कृष्णानंद गिरि को 2010 में अखाड़े में जगद्गुरु की पदवी दी गई। उज्जैन कुंभ 2016 में महेंद्रानंद गिरि को महामंडलेश्वर बनाया। मौजूदा समय में इस अखाड़े में लगभग तीन हजार संन्यासी दलित व आदिवासी वर्ग से हैं। इसमें नागा संन्यासी के अलावा मंडलेश्वर, कोतवाल, थानापति, महंत, श्रीमहंत भी हैं। आगामी कुंभ मेले में महाराष्ट, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड के करीब दर्जनभर दलित संन्यासियों को महामंडलेश्वर पद पर आसीन किया जाएगा। अखाड़ा अभी से उनके ज्ञान, समर्पण व बौद्धिकस्तर का परीक्षण करा रहा है। इसमें खरा उतरने पर ही उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी। अखाड़ों में जगद्गुरु, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर जैसे पदवी पाने से पहले संन्यासी को कड़ी परीक्षा देनी होती है। स्वयं, सगे-संबंधियों का पिंडदान करने के बाद उन्हें अखाड़ा को अपना जीवन समर्पित करना होता है। अखाड़ा कम से कम तीन साल उनकी हर गतिविधि पर नजर रखता है। वेद, पुराण का ज्ञान होने के साथ उन्हें भजन, पूजन, प्रवचन व यज्ञ में हिस्सा लेना होता है। हमारे अखाड़ा में ब्राह्माण, दलित, पिछडा व सिख जैसे वर्गो में कोई भेद नहीं होता। हम आदिशंकराचार्य व रामानंद के पदचिह्नों पर चलते हुए धार्मिक व सामाजिक समरसता पर काम करते हैं। संन्यासी की योग्यता के अनसार उन्हें पहले भी जगद्गुरु, महामंडलेश्वर तथा अन्य डलेश्वर तथा अन्य पदवी दी गई है, आगे भी दी जाती रहेगी ।जीवन के लंबे समय तक राजनीति के जरिए लोगों का दुख-दर्द बांटने वाले अमित जोशी का सामाजिक का सामाजिक जीवन से मोह भंग हो गया। उन्होंने मौज गिरि मंदिर में स्वयं एवं सगे-संबंधियों का तर्पण करके संन्यास ले लिया। अखाड़ा के पंच परमेश्वर ने उन्हें दीक्षित करते हुए तूफान गिरि नाम दिया। मूलतः पंजाब के होशियापुर जिला निवासी तूफान गिरि सिक्योरिटी व डिटेक्टिव एजेंसी चलाते थे। बचपन से आरएसएस से जुडे रहे। होशियारपुर में भाजपा यवा मोर्चा के आठसाल जिलाध्यक्ष रहे। जगद्ररु पंचानन गिरि के सानिध्य में आने पर उनका धर्म के प्रति झकाव बढा। भजन गाते-गाते प्रभ की भक्ति में ऐसा गाते-गाते प्रभु की भक्ति में ऐसा मन रमा की स्वयं का जीवन उन्हीं को अर्पण कर दिया। सामाजिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर भगवा धारण कर लिया। जी हां, हिमांचल प्रदेश के सिरमौर जिला हिमांचल प्रदेश के सिरमौर जिला निवासी रेन शर्मा के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। मौज गिरि मंदिर में मुंडन व पिंडदान करके संन्यास लेने वाली रेन अब दर्गा गिरि के नाम से जानी जाएंगी। संन्यास से पहले दुर्गा भजन गायिका के साथ ट्रैवेल एजेंसी चलाती थीं। दुर्गा बताती हैं कि गुरु पंचानन गिरि के सानिध्य कद्र में रहकर उनके मन में आया कि वह भी धर्महित में काम करें। इसके लिए उन्होंने संन्यास लिया।संन्यास ग्रहण करने के बाद कन्हैया प्रभुनंद गिरि ने देवों को नमन किया। सर्वप्रथम संगम पूजन किया। फिर नगरदेवता भगवान वेणी माधव, महर्षि भारद्वाज का दर्शन, पूजन महर्षि भारद्वाज का दर्शन, पूजन कर स्वयं का जीवन सनातन धर्म की रक्षा एवं प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। बांध स्थित जूना अखाड़ा के आश्रम से मंगलवार की शाम कन्हैया से मगलवार को शाम कन्हया शोभायात्रा की शक्ल में संगम तट पहुंचे। जयकारों व मंत्रोच्चार के बीच संगम का पूजन किया। इसके बाद कारवां वेणी माधव मंदिर व भारद्वाज आश्रम पहुंचा। मूलत- आजमगढ़ के बरौली निवासी कन्हैया प्रभुनंद गिरि दलित वर्ग से आते हैं। यमुना बैंक रोड स्थित मौज गिरि मंदिर में उन्हें विधिवत संन्यास दिलाकर पट्टाभिषेक किया गया। पूजन के दौरान अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि, अखाड़ा के मुख्य संरक्षक हरि गिरि, कुंभ मेलाधिकारी विजय किरन आनद, पुष्कर गिरि, नीलकठ गिरि, प्रमेंद्र गिरि, हरिशंकर गिरि, स्वामी बृजभूषण दास मौजूद रहे। नमूषण